रविवार, नवंबर 22, 2015

मै प्रेम शब्द बचा लेना चाहता हूं उस लमटंग्गे लड़के के लिये जो सुलगती धूप मे अपनी सायकिल से गली के चौदह चक्कर लगाता है , मै प्रेम का शब्द बचा लेना चाहता हूं उस दुबली लड़की के लिये जो अपने जर्द चेहरे मे धंसी उदास आंखो से देखती है बारिश , महसूसती है सीलन , मै प्रेम का शब्द बचा लेना चाहता दीदी के लिये जिसकी तस्वीर को आज चौथे लड़के ने नकार दिया , मै प्रेम का शब्द बचा लेना चाहता हूं उस क्वांरे और बेरोजगार पगलेट कवि के लिये जो आधी रात तक छत पर चांद निहारता है फ़िर बुझी बीडी को जला कर अपने उदास तरन्नुम से रात को और उदास करता है , मै प्रेम का शब्द बचा लेना चाहता हूं नवी मे पढते अपने निमुछिये भाई के लिये जो अपनी प्रेमिका की कलाइ को बस छूना भर चाहता है मै प्रेम का शब्द बचा लेना चाहता हूं अपनी बहन के लिये जिसे विग्यापन सुंदरी ने बताया है कि तुम काली और भद्दी हो इसलिये प्यार के नाकाबिल हो , मै प्रेम का शब्द बचा लेना चाहता हूं उन सबके लिये जिनके पास न जर है ना जोर सिर्फ है नंगी जेबें और जिन्होंने विलायति कहवा घरों के बस नाम भर सुने हैं , मै प्रेम का शब्द उन सब के हक़ मे बचा लेना चाहता हूं जिनके पास प्रेम के नाम पर कुछ रुखे छूछे भाव है जिसे बज़ार ने और बेतर्तीब बना डाला है और जिनके पास ना प्यार के मैनर की बज़ारवादी डिक्सनरी है ना ही फ्लर्ट चैट डेटीन्ग का सभ्यत्तम आइडीया ना ही उनका बोध , और अन्तत : मै प्रेम को इस बज़ार से बचा लेना चाहता हूं जिसने प्रेम को एक उत्पाद और नुमाईशी बना डाला है , साथ ही मै चाहता हू प्रेम को बचा लेना बज़ार के गिरफ़्त से अपेक्षाकृत अछुते कस्बाई प्रेम को जिसे बज़ारवादी सलीके मे pervert करार दिये जाने का खतरा है .
आज के दौर मे प्रेम पर बज़ारवाद के दबाव को महसूसते हुए ...........राजशेखर

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