थाली भर का चाँद
उगता है मेरे मुँडेर पर
और मैं
हाँक देता हूँ अक्ल का पहरुआ ,
उतार देता हूँ हिय का साँकल
पांव रोप कर ड्योढ़ी पर
तुझे अगोरता हूँ , डाकता हूँ तेरा नाम
मेरे इर्द-गिर्द फलाँगने लगते है
भावों के शशक
मेरी पकड़ से दूर ………बहुत दूर
उगता है मेरे मुँडेर पर
और मैं
हाँक देता हूँ अक्ल का पहरुआ ,
उतार देता हूँ हिय का साँकल
पांव रोप कर ड्योढ़ी पर
तुझे अगोरता हूँ , डाकता हूँ तेरा नाम
मेरे इर्द-गिर्द फलाँगने लगते है
भावों के शशक
मेरी पकड़ से दूर ………बहुत दूर
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