असल में उसमे अतिरिक्त और संवेदनशील होने के अलावा कोई कुटैव नहीं था . फिर भी वह किसी सामान्य दिन का आधा हिस्सा फोकटिया चाय के जुगाड़ में खर्चता और चाय वह ठंढी होने के बाद ही पीता पर चाय तो महज एक बहाना था वह चाय के बहाने बतियाता था सुख -दुःख , राग-रोग अपने भीतर पैठे गाँव का करता था संस्कार और हृदय के किसी मुलायम कोने को और मुलायम करता था . इस आधुनिक और अजनबी शहर में अर्सों तक रहने के बाद भी नागर नहीं हो पाया था क्योंकि अपने भीतर बसे ठेठ देहात को वह बड़ी शिद्दत से बचा लेना चाहता था . वह हँसता तो मगही अंदाज में किसी को नाम लेकर टेरता तो भोजपुरी आत्मीयता से और जब मुलायम होता तो मैथिलि हो जाता . इस शहर की सर्वग्रासी सड़कों पर ऐसे घूमता जैसे अपने खेत की पगडण्डी पर झूम रहा हो और जब बतियाता तो एसे बेबाकी से बतियाता जैसे अपने गाँव के चौरे पर बतिया रहा हो . मिलनसार इतना की चाँद मिनटों में किसी का हो जाता इसलिए सभी का हो जाता . वह जब किसी के साथ गुदगुदाता तो पागलों की तरह हँसता और किसी के दुःख में पसीजता तो बच्चा हो जाता .बह बड़ी आत्मीयता से सुनता किसी का सुख दुःख और फिर सुनते हुए वट-बरगद की तरह फैल कर छतनार हो जाता .वह फ़कत एक जोड़ी आँख से वह खंगाल लेता जिसे "जन-चिंता " में घुलते और बौद्धिक जुगाली करने वाले दर्जन भर दार्शनिक और एकादमिक उल्लू भी निहार नहीं पाते वह हमेशा प्रस्तुत होता निशर्त निस्वार्थ तन मन धन से जिसे आज के स्भ्यतम और आधुनिक नुमायशी सलीके में सुविधानुसार चैरिटी या सोशल वर्क कहा जा सकता है . वह कुछ ऐसा था जिसे आप अपने असुरक्षित और आधुनिक नागर बोध को तुष्ट करने के लिए गँवार , नंगा , भुच्च या फिर " बिहारी" कहकर गलिया सकते है . पर वह हमारे सभ्यतम आधुनिक संस्कारों को मुंह बिराते हुए शहरी संस्कारो का गंवई प्रत्याख्याँन था जो संस्कार-दूषित या संस्कार-भूषित होकर प्रोफेशनल नहीं हो पाया था .
...............राजशेखर
...............राजशेखर
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