ऐ उन दिनों की बात है की बात है जब घर, घर हुआ करता था जिसमें हसीं-खिलखिलाहट से आबाद एक आँगन, जिन्दगी के सबूत के तौर पर एक सायबान , गली में किसी के इन्तजार में लगी एक जोड़ी आँख बाला कोर्निश हुआ करता था ..तब सेपरेट , प्राइवेट , और प्राइवेसी जैसे अल्फाजों का ना तो चलन था ना ही कोई मायने .तब घर में बैठ कर बाहर के बदलते मौसम को अपने जिस्म पर महसूस किया जा सकता था ...तब बारिश में आँगन भींगता , सर्दियों में सायबान सिहरता और गर्मियों में धूप की बालिग़ गिलहरी बरामदे में फुदकती .तब घरों में तेज रोशनी के बल्ब नहीं बल्कि बहुत ही मद्धम चिराग जलते थे और तब आदमी के जेहन रौशन हुआ करते थे . तब घर के बारे में बोलते समय इंसान की आँखे चमकने लगती उसके भीतर कुछ पिघलने लगता और उसकी आबाज भींग जाती और घर जाने के ख्याल भर से ही इन्सान खिल कर गुलाब हो जाता . तब घर भले ही धुले –निखरे और रंगे पुते ना दिखते पर घर में रिश्तों का रंग बहुत चटक हुआ करता था . तब आदमी जब घर में होता कई कई रिश्तों के साथ जी रहा होता किसी का बेटा होता तो किसी का पोता होता किसी का चाचा होता तो किसी का मामा होता किसी का देवर होता तो किसी का जेठ होता और न जाने कितना कुछ और क्या क्या होता पर कभी अकेला नहीं होता . तब घरों में आज की तरह इतनी सुबिधायें तो नहीं होती पर सकूँ ढेर सारा होता . तब घर छोटा हो या बड़ा घर के लोगों के दिल में इतनी जगह होती अतिथि और मेहमानों के अलाबे जानबरो और पक्षियों की कई नस्ले आराम से रहती . ऐ उन दिनों की बात है जब घर घर हुआ करता था और घर मतलब सिर्फ चहार-दिवार नहीं घर मतलब बहुत कुछ होता था ……………………………………………………………………………..
...........................................................................................आज , जब मै दस सालों से बेघर हूँ किसी ने घर की याद दिला दी है .
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