रविवार, नवंबर 22, 2015

“एक ठिठुरता हुआ इन्तजार”
कोई रोज
जब कुर्बत में
पिघलेगी ख़ामोशी
दिल की अंगीठी में
दहकेंगे जज्बातों के कोयले
रिश्तों की रगों में दौड़ेंगे
गर्म-गर्म लहू
तब पिघलेगा अल्फाजों का आबशार
और तसौवर के छुटेंगे पसीनें
हकीक़त की धूप में नहा कर
जेहन में उतरेंगी ख्वाबों की परियां
कहकहे की लोरी सुनकर
सो जायेगा
कई रातों से जगता हुआ सन्नाटा
तब तब्बसुम होगा तर्रन्नुम होगा
रंग होगा रौशनी होगी
सुबह सब्ज होगी शाम सुरमई होगी
तब रंगीन होगी रात और हसीन होगी हयात
(.................ऐसे में जब तुमने अपने लबों पर ख़ामोशी के जेवर पहन रक्खें हैं , मै अपने दिल की वीरान बस्ती को येसे ही उम्मीदों से आबाद रखता हूँ .......राजशेखर )
कुर्बत-nearness अंगीठी-furnace जज्बातों-emotions अल्फाजों का आबशार-cascade of words तसौवर-imagination तब्बसुम-laughter तर्रन्नुम- rhythm सब्ज-green हयात-life
-

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें