रविवार, नवंबर 22, 2015

रातभर आगन में झरती रही होगी शेफाली 
गीले होते रहे होंगे तेरे तकिये का गिलाफ 
आहे जब्त कर रात भर 
बिस्तर पर करवटें बदलता रहा 
घर के टूटे मुंडेरों पर बैठा होगा चाँद
घंटों तुमसे रूबरू होकर
शहर में सच का सूरज निकला है
रात को ,उसकी आग में जलता रहा
झींगूरों ने बजाई होगी शहनाई ,
जज्बातों ने रचाया होगा बियाह
चीखते शहर में रातें बड़ी सर्द थी
मैं तनहा मचलता रहा
बहक रही होगी रातरानी की खुशबू
तेरी चूड़ियों की खनक के साथ आँगन में
पेट की आग और बीमार माँ के ख्याल से
शहर में संभलता रहा ...........राजशेखर

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