रविवार, नवंबर 22, 2015

जिस्म पर रेंगती है तुम्हारी छुअन , ख्यालों में तुम्ही जम्हाईयाँ लेती हो , दिल में गुड़ की तरह पिघलती रहती हो दिन भर और मेरे आरजू की बस्ती तुम्ही से तो आबाद है. ख्वाबों में रोज खिलती हो गुलाब की तरह, मेरे बासी और दम ब दम घुटते जिन्दगी में आते ही आवारा हो जाती हो खुशबु की तरह. एक पहर रात बीतते ही खटखटाती हो मन का सांकल और हर रोज चुपचाप मेरे ख्वाबगाह में आकर महफ़िल की तरह बिछ जाती हो, अपनी दुधिया हसीं से धो देती हो मेरे मन का पाप-कालिख , मुफलिसी के इस दौर में मुझे बख्श देती हो जज्बातों और एहसासों की बेशुमार दौलत . मेरा हरेक हर्फ़ और अल्फाज़ तुम्हारे ही तो जेबर है और तुम्ही से तो मैं सीखता हूँ प्यार की तमीज़ ,
(उस लड़की के लिए जो खुले बालों और अधखुली आखों के साथ एक अलसाई पीली-सुनहरी सुबह में तब्दील हो गयी है )

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