रविवार, नवंबर 22, 2015

............................ एक गुजिश्ता शब .................................................................
आसमान के दामन पर बिछ गया है तारों का तिलिस्म , बहुत करीने से फ़ैल गया है रात के जिस्म पर पिघलता हुआ चाँद , रह रह कर न जाने किस ख्याल से गुदगुदा उठती है पुरबाई और तह करके रख दी गयी यादों में डाल देती है सलवटें , चाँद की दुधियां रौशनी में नहा कर सामने का बुढा बरगद बच्चों की तरह सिहर उठता है ..जिन्दगी की सारी शिनाख्त बंद कर दी गयी है कोहरे के झीने गिलाफ़ में , घड़ी चूहा बनकर कुतरता रहता है वक्त और बहुत ही साफ़ सुनाई देता है कुतरे जाते वक्त की आवाज टिक-टिक टिक-टिक आपके प्रेम का पहरुआ रात भर आवाज लगाकर हांकता रहता है ऐयाश ख्यालों का सेंधमार , मन के आँगन में फुदकने लगते है ख्यालों के उजले मुलायम ख़रगोश , तसव्वुर के बियावान इलाक़े में आबाद हो जाता है हर्फ़-अल्फाजों का चमन और आँखों की दहलीज पर मै जला देता हूँ इन्तजार का दिया उम्मीद है इसके अफ़सुर्दा होने तक आप लौट आयेंगे .

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