स्निग्ध संवेदनाओं से सींचा हुआ , अहम् और निज का निथरा हुआ बहुत ही उत्तरदायित्वपूर्ण शब्द है-- प्रेम- जो करुणा और दया से पोषित हो और भी विश्वजनीन स्वरूप ग्रहण करता है . आदिम रागों के धधक-लहक से परे रागों की अंगीठी की मीठी आँच है प्रेम जिसमे कई रिश्ते नाते पकते-सीझतें है . और अंततः प्रेम वह अवस्था है जब हृदय कोमल भावनाओं का स्त्रोत हो जाता है . प्रणय और परिणय की परिधि में परिक्रमा करते प्रेमी और प्रेम से परे है- “प्रेम”. जहाँ तर्क वर्जित, विवेक विसर्जित और बुद्धि व्यतीत हो गया हो वही भावभूमि है प्रेम की .........शब्दों के सामर्थ्य और परिभाषा की मर्यादा को नकारते हुए ...........अनिर्वचनीय और अपरिभाषित सा है प्रेम .
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