रोज भिनसारे आकर
बुहार देती हो तर्क का कूड़ा
लीप कर मन का आँगन
उसमें बनाती हो रिश्तों की रंगोली
भावों को फटक-पछोर कर करती हो निर्मल
फिर सुलगा जाती हो रागों की अगरु-बर्तिका
महक बहक कर सुरभित होता है
मेरा मन प्रांगण
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राजशेखर
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