रविवार, नवंबर 22, 2015

वक्त ने जिसे आजमा कर छोड़ दिया 
वो बुढ़िया किसी की 
दादी , नानी ,अम्मा रही होगी 
जिसने अपने जर्द चेहरे की किताबो में 
झुर्रियों की इबारत में 
कैद कर रखा है वक्त
जो बयां करते है लातादाद किस्से
तब जम जाता है वक्त दही की तरह
तब ये लगता है की जो सुना है
गलत सुना है
की बहता है वक्त पानी की तरह
दरअसल बरगद है वो बुढ़िया
जिसके सामने सहम जाती है रफ़्तार
रुक जाते है वक्त के कदम
और उसके आगोश में सुस्ता लेती है जिंदगी
……………………… राजशेखर

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