विस्मृति को शापित हम
लोकतंत्र के महापर्व में भूल जाते है
अंधे गूंगे हुक्मरानों को
फिर होती है मूर्खता की पुनरावृति
भेडो का भविष्य सुरक्षित कर दिया जाता है
दांतों में दूर्वा-दल लिए ढपोरशंख भेडिये के हाथ
लोकतंत्र का चौथा आदमी
जिसकी तोंद भयावह तरीके से वर्तुलाकार हो रही
चिल्लाता है सत्य, सत्य, वस्तुनिष्ट सत्य
जिससे शक्ति के प्रति चटोरेपन की लार टपक रही होती है
और हम यानि की जनता
नाना डार्विन के निष्कर्ष को गलत करके
विज्ञानं को चुनौती देते हुए स्थापित करते है
की आदमी के पूर्वज बंदर नहीं भेड़ है .................[ भेड़तंत्र यश-वर्धन के निमितार्थ लिखी गयी कविता ......राजशेखर )
लोकतंत्र के महापर्व में भूल जाते है
अंधे गूंगे हुक्मरानों को
फिर होती है मूर्खता की पुनरावृति
भेडो का भविष्य सुरक्षित कर दिया जाता है
दांतों में दूर्वा-दल लिए ढपोरशंख भेडिये के हाथ
लोकतंत्र का चौथा आदमी
जिसकी तोंद भयावह तरीके से वर्तुलाकार हो रही
चिल्लाता है सत्य, सत्य, वस्तुनिष्ट सत्य
जिससे शक्ति के प्रति चटोरेपन की लार टपक रही होती है
और हम यानि की जनता
नाना डार्विन के निष्कर्ष को गलत करके
विज्ञानं को चुनौती देते हुए स्थापित करते है
की आदमी के पूर्वज बंदर नहीं भेड़ है .................[ भेड़तंत्र यश-वर्धन के निमितार्थ लिखी गयी कविता ......राजशेखर )
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